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Tuesday, 27 February 2024
चिन्तन
Wednesday, 7 July 2021
चेतावनी
दृश्य १.
[२१ वीं शदी के अंतिम दशक की एक विशाल प्रयोगशाला, जिसकी दीवारों व छत का प्रत्येक छोटे से छोटा भाग भी किसी न किसी यंत्र के पीछे छिपा है। दर्जन भर से भी अधिक बेडौल सी आकृति-प्रकृति के यंत्र प्रयोगशाला में इधऱ-उधर चहलकदमी करते दिखाई पड़ रहे हैं। जो दूसरे यंत्रों का संचालन करने के साथ-साथ आवश्यक सामग्री का आदान-प्रदान भी कर रहे हैं।
विभिन्न यंत्रों से उत्पन्न होने वाली धीमी ध्वनियाँ मिश्रित स्वर में किसी बीहड़ जंगल में अनेक कीटों द्वारा उत्पन्न ध्वनि का आभास दिला रहीं हैं।
तभी प्रयोगशाला का द्वार खुलता है और विश्व के महान वैज्ञानिक डा मनु एक सामान्य वेषभूषा में प्रयोगशाला में प्रवेश करते हैं और एक बड़ी ही नियंत्रित दृष्टि पूरी प्रयोगशाला की व्यवस्था पर डालते हैं। फिर एक अलमारी की ओर बढ़ते हैं जो उनके निकट पहुँचने पर स्वतः ही खुल जाती है। तब डा. मनु कवच सदृश कुछ यंत्र उसमें से निकालकर अपने हाथों, सर व सीने पर लगा लेते हैं और अपने कार्य में जुट जाते हैं।
उसी समय एक दिव्य ज्योति प्रयोगशाला में प्रकट होती है और एक मनुष्य का रूप धारण करती है। उसकी वेषभूषा पन्द्रहवीं शताब्दी के किसी विद्वान पंडित के समान है परन्तु मुख मण्डल पर एक अनुपम तेज है]
डा.मनु - (चौंककर, तेज़ी से) कौन........., कौन हो तुम? सावधान, अपनी जगह से हिलना नहीं!
अजनबी - (शान्त स्वर में) हम ब्रह्मदूत हैं, आपको अपने साथ ले चलने के लिए आए हैं।
डा. मनु - कौन ब्रह्मदूत? (विचलित होते हुए) कहाँ ले जाना चाहते हो मुझे???
ब्रह्मदूत - मुझे पूज्य श्री परमपिता ब्रह्मा जी ने आपको ब्रह्मलोक लिवा लाने के लिए भेजा है।
डा. मनु - (लापरवाही से) कौन ब्रह्मा? मैं किसी ब्रह्मा को नहीं जानता। (कुछ याद करके) अरे हाँ..... कहीं तुम उन ब्रह्मा जी के बारे में तो बात नहीं कर रहे जिन्हें पहले सृष्टि का जनक कहा जाता था !?
ब्रह्मदूत - जी हाँ , उन्हीं ने मुझे यहाँ दूत बनाकर भेजा है।
डा. मनु - (शंकित दृष्टि से) इसका कोई प्रमाण?
ब्रहमदूत - (तनिक क्रुद्ध होकर) (तेज़ी से) हमें झूठा कहकर तुम हमारा अपमान कर रहे हो, मनुष्य....।
डा. मनु - (हँसते हुए) नहीं-नहीं क्रोधित मत होईये ब्रह्मदूत जी, मेरा यह मतलब नहीं था। मैं तो जानना चाहता था कि आखिर ब्रह्मा जी को मुझ अकिन्चन की क्या आवश्यकता आन पड़ी!!!???
ब्रह्मदूत - (शान्त होकर) यह तो तुम्हें उनके पास चलकर ही ज्ञात हो सकेगा। चलिए जल्दी तैयार हो जाईए।
डा. मनु - (व्यंग्यात्मक स्वर मेंं) यदि मैं मना करूँ तो....?
ब्रह्मदूत - (तुनककर) मूर्ख...... मनुष्यों ने तो उनका एक दर्शन पाने मात्र के लिए सैकड़ों-सैंकड़ों वर्षो तक भूखे-प्यासे रहकर तपस्या की है और तुम्हें जब उन्होंने स्वयं याद किया है तो तुम मना कर रहे हो!!!
डा. मनु - अरे नहीं ब्रह्मदूत जी...... मैं तो ये कह रहा था कि इतनी भी क्या जल्दी है, अभी तो आप इतनी दूर से आए हैं..... थोड़ा विश्राम तो किजिये। फिर चलते हैं।
ब्रह्दूत - नहीं, हम यहाँ अधिक देर नहीं रुक सकते। ब्रह्मदेव ने हमें कठोर आदेश दिए हैं कि हम यहाँ किसी भी वस्तु को स्पर्श न करें।
डा. मनु - (विस्मित होकर) परन्तु...ऐसा क्यों.....??
ब्रह्मदूत - क्योंकि तुमने प्रकृति के कण-कण को तोड़-मरोड़कर रख छोड़ा है। जिससे यहाँ सबकुछ हमारे लिए अत्यन्त अविश्वसनीय हो गया है। अब वार्तालाप में समय नष्ट मत करो और अतिशीघ्र प्रस्थान के लिए तैयार हो जाओ।
डा. मनु - (लाचारी पूर्वक) ठीक है.... अब आप जिद्द पर अड़ ही गये हैं तो चलिए.......इस बहाने आपके ब्रह्मलोक भी घूम आऐंगे।
ब्रह्मदूत - चलिए....... (रुककर) पहले अपने ये आभूषण यहीं उतार दीजिए।
डा. मनु - (आश्चर्य से) आभूषण.....!!!??? (हँसते हुए) ओह..., अच्छा-अच्छा....।
[डा. मनु यंत्रों को उतार कर रख देते हैं और फिर दोनों अंतर्ध्यान हो जाते हैं]
दृश्य २.
[डा मनु एक विचित्र स्थान पर आश्चर्य से चारों ओर देखते हुए अकेले अकेले चले जा रहे हैं। चारों ओर अपूर्व शान्ति है। वे जिधर देखते हैं उन्हें विभिन्न रंगों से प्रकाशित असंख्य तारे दिखाई पड़ते हैं]
डा मनु - क्यों ब्रह्मदूत जी, अभी कितनी दूर बाकी है अपका ब्रह्मलोक?
[डा मनु चारों ओर देखते हैं परन्तु वहाँ उनके अतिरिक्त कोई नहीं है]
डा मनु - (घबराकर) अरे ब्रह्मदूत जी......(तेजी से) ब्रह्मदूत जी!!........ओह नो......यह ब्रह्मदूत मुझे यहाँ छोड़कर कहाँ गायब हो गया!!??(चिंतित होकर अपने-आप से)अब मुझे क्या करना चाहिए!!!
[तभी ब्रह्मदूत की आवज सुनाई पड़ती है]
ब्रह्मदूत की आवज - शान्त रहो मनुष्य, शान्त रहो........!
डा मनु - (चौंककर) अरे ब्रह्मदूत जी, आप हैं कहाँ? (कुछ परेशान होकर) देखिए ब्रह्मदूत जी, मुझे न तो यहाँ से ब्रह्मलोक का रास्ता पता है और न ही मैं ब्रह्मदेव जी को पहचानता हूँ। देखिए प्लीज़ पहले एक बार उनसे मेरा परिचय करा दीजिए, फिर कहीं चले जाइएगा।
ब्रह्मदूत की आवाज - शान्त रहो मनुष्य, उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मदेव जी के आदेशानुसार तुम ओर आगे नहीं जा सकते। ब्रह्मदेव स्वयं यहीं आकर तुमसे मिलेंगें।
डा मनु - परन्तु ऐसा क्यों???!!!
ब्रह्मदूत की आवाज - तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर भी तुम्हें उन्हीं से मिल सकता है।
[चारों ओर पूर्ववत शान्ति छा जाती है। डा मनु कातर दृष्टि से चारों ओर देखने लगते हैं। अचानक एक अत्यन्त तीव्र प्रकाश बिम्ब प्रकट होता है। जिससे आँखों को चौंधिया देने वाला प्रकाश निकलकर चारों ओर फैलने लगता है। साथ ही मन को लुभा लेने वाला एक धीमा-मधुर संगीत भी गूँजने लगता है। डा मनु प्रकाश की चकाचौंध से बचने का प्रयास करते हुए कुछ देखने की चेष्टा करते हैं। उसी समय एक अनूठी सुगन्ध फैलती है और कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्मदेव प्रकट होते हैं। उनके उस अद्वितीय तेजोमय रूप को देखकर डा मनु का हृदय भावविहृल हो उठता है और वे न चाहते हुए भी ब्रह्मदेव के चरणों में गिर पड़ते हैं]
ब्रह्मदेव - तुम्हारा कल्याण हो वत्स! उठो.....उठो वत्स!!
डा मनु - (खड़े होकर, शिकायत पूर्ण स्वर में) ब्रह्मदेव! जब आपने मुझे पृथ्वी से यहां तक बुलवा लिया तो फिर ब्रह्मलोक तक जाने से क्यों रोक दिया?
ब्रह्मदेव - वत्स! तुम्हारे मन में ज्ञान प्राप्ति की जो प्यास जगी है, मैं उससे भली भांति परिचित हूँ। परन्तु जब तक तुम इस सृष्टि के दूसरे रहस्यों को नहीं सुलझा लेते तब तक तुम ब्रह्मलोक नहीं पहुँच सकते।
डा मनु - बह्मदेव! क्या सचमुच इस सम्पूर्ण सृष्टि की रचना आप ही ने की है!?
ब्रह्मदेव - हाँ वत्स, यह सम्पूर्ण सृष्टि मेरे द्वारा ही रची गई है।
डा मनु - (आश्चर्य से) परन्तु ब्रह्मदेव! आपने यह सब किस प्रकार किया!?कृपा करके मुझे इसके बारे में सबकुछ विस्तार से बतलाइए!
ब्रह्मदेव - (हँसते हुए) वत्स, तुम्हारी ज्ञान प्राप्ति की प्यास किस स्तर तक बढ़ चुकी है, मुझे यह देखकर एक सुखद आश्चर्य हो रहा है। परन्तु........।
डा मनु - परन्तु क्या......ब्रह्मदेव? क्या मुझसे कोई त्रुटि हुई है? अथवा आप मुझसे रुष्ट हैं??
ब्रह्मदेव - नहीं-नहीं पुत्र....मैं तो तुमसे अति प्रसन्न हूँ। ज्ञान प्राप्ति की तुम्हारी इसी लम्बी अटूट तपस्या के फलस्वरूप ही आज तुम्हें मेरा दर्शन प्राप्त हुआ है। परन्तु पृथ्वी पर हो रहे तुम्हारे ज्ञान के दुरुपयोग को देखकर हम भूलोक के भविष्य लिए चिंतित हैं!
डा मनु - मेरे ज्ञान का दुरुपयोग !!! अर्थात् विज्ञान का दुरुपयोग!!! (हँस कर) ब्रह्मदेव! आपको निश्चय ही या तो भ्रम हुआ है अथवा किसी ने हमारी प्रगति से जलकर आपके कान भरे हैं।आप ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान मत दीजिए।
ब्रह्मदेव - (क्रमशः तीव्र होते स्वर में) मुझे किसी से भी जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती वत्स, मैं स्वयं सबकुछ स्पष्ट देख सकता हूँँ। प्रकृति का बिगड़ता सन्तुलन, क्या तुम्हारे विज्ञान के दुरुपयोग का परिणाम नहीं है? मैंने दिन के समय प्रकाश हेतु सूर्य की व्यवस्था की थी, तुम्हें दिन के समय भी रात के अंधकार की आवश्यकता पड़ी। तुमने उसका प्रबन्ध कियाा। मैंनें विश्राम हेतु रात व रात को अन्धकारमय बनाया। परन्तु तुमने दिन के प्रकाश से भी अधिक प्रकाश का प्रबन्ध कर लिया......। तुमने यह सब ज्ञानार्जन हेतु किया, उचित है। परन्तु वह मनुष्य जिन्हें सूर्यास्त के पश्चात प्रकाश की आवश्यकता नहीं है, वे भी तुम्हारी तरह रात में प्रकाश उतपन्न करते हैं और दिन के समय कृत्रिम अन्धकार में सोते हैं। क्या यह विज्ञान का दुरुपयोग नहीं है? तुमने पृथ्वी को खोदा, जल को बाँधा, वायु को रोका.....किन्तु यह सब किया केवल ज्ञानार्जन के लिए। परन्तु वह लोग जिन्हें इसकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं, क्या वे ऐसा करके विज्ञान का दुरुपयोग नहीं कर रहे हैं???
डा मनु - परन्तु हे परमपिता! जैसा कि अभी आप ने स्वीकार किया कि मैंने जो कुछ किया ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया, अतः अब यदि वे मेरे इस ज्ञान का उपयोग धन प्राप्ति के लिए कर रहे हैं, निज सुख के लिए कर रहे हैं तो इसमें दुरुपयोग कैसा!?
ब्रह्मदेव - (पीड़ा भरे स्वर में) विज्ञान का उपयोग बुरा नहीं है वत्स! परन्तु विज्ञान का उपभोग बुराई की परिसीमा है......और वे इसका उपभोग कर रहे हैं, उपयोग नहीं। विज्ञान के उपभोग ने उन्हें आलसी, अकर्मण्य, कमजोर व कामी बना दिया है।
डा मनु - परन्तु, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ!!! जिस प्रकार मेरे जीवन का लक्ष्य ज्ञानार्जन है, उसी प्रकार उनका लक्ष्य धनार्जन है।
ब्रह्मदेव - (कठोरता के साथ) नहीं वत्स, नहीं.....धनार्जन मानव जीवन का लक्ष्य कदापि नहीं हो सकता।
डा मनु - क्यों ब्रह्मदेव, यदि ज्ञानार्जन मानव जीवन का उद्देश्य हो सकता है तो धनार्जन मानव जीवन का उद्देश्य क्यों नहीं हो सकता?!
ब्रह्मदेव - क्योंकि संसार में धन अर्थात सन्साधनों की एक सीमित मात्रा है। और जब दो प्राणियों का उद्देश्य उस पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना बन जाएगा तो शीघ्र ही उनके बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी तथा संघर्ष से केवल विनाश होता है, प्रकृति का विनाश, मानवता व मानवता के मूल्यों का विनाश, ज्ञान का विनाश, विज्ञान का विनाश और विनाश होता प्राणी मात्र का........।
डा मनु - परन्तु ब्रह्मदेव! आपने मुझे किस लिए याद किया?
ब्रह्मदेव - हम चाहते हैं कि तुम पृथ्वी पर हो रहे विज्ञान के दुरुपयोग को रोको। ताकि पृथ्वी पर होने वाले काल के भीषण विनाश के ताण्डव को रोका जा सके।
डा मनु - परमपिता, मैंने तो सुना है कि इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी होता है, सब आपकी आज्ञा अनुसार ही होता है। आप ही सबके भाग्य विधाता है। अब यदि आपने पृथ्वी और पृथ्वी वासियों के भाग्य में यह विनाश ही लिखा है तो भला मैं उसे किस प्रकार बदल सकूँगा?
ब्रह्मदेव - मैं तुमसे एक प्रश्न करता हूँ, पुत्र......।
डा मनु - (किन्चित उलझन के साथ) कैसा प्रश्न ब्रह्मदेव!?
ब्रह्मदेव - तुमने पृथ्वी पर अपनी सहायता के लिए बहुत से यंत्रों का सृजन किया है। तुम उनके बारे में क्या बता सकते हो?
डा मनु - (उत्साहित होकर) उनके बारे में तो मैं सब कुछ पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वह किस समय क्या कार्य करेंगे, किस प्रकार कार्य करेंगे, कितने समय तक कार्य करेंगे आदि आदि.....।
ब्रह्मदेव - परन्तु यदि में तुम्हारे उन यंत्रों के ऊर्जा स्रोत बदल दूँ, उनमें लगे विभिन्न उपकरणों को बदल दूँ, तो क्या तब भी तुम इसी विश्वास के साथ उनके बारे में कुछ कह सकोगे?
डा मनु - तब तो शायद असम्भव हो जाएगा......।
ब्रह्मदेव - आज पृथ्वी पर भी यही हो रहा है। जो वायु प्राणदायी थी, आज प्राणाहारी बन चुकी है। जल, जो जीवन दायक था, आज जीवन नाशक बना हुआ है। (अत्यंत दुखी होकर) तुम मनुष्य तो यान्त्रिक प्रबन्ध करके कुछ समय ओर इनके दुष्परिणामों से स्वयं को बचा कर लोगे, परन्तु दूसरे प्राणी तो तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहे हैं। उन्होंने तो तुमसे, तुम्हारे विज्ञान से कुछ भी नहीं माँगा था। फिर उन्हें किस बात का दण्ड......???
(ब्रह्मदेन का स्वर अत्यन्त करुण हो जाता है)
यह समूची पृथ्वी मेरी समस्त रचनाओं में अनमोल है......और उससे भी महत्वपूर्ण हैं इस पर वास करने वाले प्राणी......। मैं इनकी यह दुर्दशा देखकर अत्यन्त दुखी हूँ!
डा मनु - परन्तु ब्रह्मदेव! मैं इसे किस प्रकार रोक सकता हूँ? कृपया इसका उपाय भी बताइए!
ब्रह्मदेव - इसका तो मात्र एक ही उपाय है कि तुमने जो ज्ञान, जो विज्ञान पृथ्वी पर बिखेरा है, उसे समेट लो, छीन लो उन मनुष्यों से जो उसका सदुपयोग नहीं कर सकते.......। विज्ञान कोई खिलौना नहीं है, पुत्र! विज्ञान तो ज्ञान प्राप्ति का अमोघ अस्त्र है। धन प्राप्ति के लिए इसका प्रयोग सर्वथा दुरुपयोग है। विज्ञान का विनाशकारी दुरुपयोग......।
डा मनु - परन्तु भगवन! मैं अब उसे वापस कैसे ले सकता हूँ? और फिर क्या ऐसा करने से मैं संसार में स्वार्थी नहीं कहलाऊँगा??
ब्रह्मदेव - (तेज स्वर में) परन्तु यदि यह सब न रोका गया तो क्या तुम बचा सकोगे अपने इस ज्ञान को, विज्ञान को? साकार कर सकोगे अपने उन सपनों को जिन्हें तुम देख रहे हो अपने और अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य के लिए, मानवता के भविष्य के लिए? क्या झुठला सकोगे इस सत्य को कि सृष्टि के उस महाविनाश के उत्तरदायी तुम और केवल तुम होगे? और झुठला सकोगे इस सत्य को कि तुमने केवल अपनी मानसिक तृप्ति के लिए सम्पूर्ण जगत को बलिवेदी पर रख दिया......।
(ब्रह्मदेव अंतर्ध्यान हो जाते हैं और डॉक्टर मनु अपने चेहरे को दोनों हाथों में छुपा कर पीड़ा भरे स्वर में जोर चिल्लाते हैं)
डा मनु - नहीं.....नहीं, यह नहीं हो सकता.....नहीं हो सकता.....।
दृश्य ३
[प्रयोगशाला का वही दृश्य, सब कुछ व्यवस्थित क्रम से चल रहा है। कुछ ही क्षणों पश्चात डॉक्टर मनु उसी दीन-हीन अवस्था में प्रयोगशाला के मध्य प्रकट होते हैं और प्रयोगशाला में चारों ओर एक डरी-सहमी सी दृष्टि से देखते हैं। फिर उनके खोए-खोए से कदम एक दिशा में बढ़ते हैं। वे हाथों में एक उपकरण को उठाते हैं, उसे उलट-पलट कर देखते हैं और पटक देते हैं। फिर दूसरे उपकरण को छूते हैं परन्तु रोते हुए एकदम पीछे घूम जाते हैं और दोनों हाथों में अपना चेहरा छुपाकर घुटनों के बल पर फर्श पर गिर जाते हैं।]
डॉक्टर मनु - [चीखते हुए] नहीं, ब्रह्मदेव नहीं.....यह नहीं हो सकता, नहीं हो सकता ब्रह्मदेव......!
[उसी समय उनके कानों में एक आवाज गूँजती है]
आवाज - डा मनु, तुम्हारा जीवन, तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा विज्ञान इस संसार के उत्थान के लिए है। यदि आज तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा विज्ञान ही इस संसार के पतन का कारण बन रहा है, तो समेट लो इसे और इस मानव लोक को उस महाविनाश का ग्रास बनने से बचाकर प्राणी मात्र की उन भावी पीढ़ियों को एक ऐसा सुन्दर और पुष्ट संसार भेंट करो, जिसमें जीने वाला प्रत्येक प्राणी निरन्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर होते हुए ज्ञान और विज्ञान की उन ऊँचाइयों को स्पर्श करें जिन्हें आज तुम पाना चाहते हो......हो सकता है उस समय तुम ना रहो परन्तु तुम्हारी वे भावी पीढियाँ तुम्हें सदैव अपने बीच अनुभव करेंगी। उसी से तुम्हें आत्मतुष्टि प्राप्त होगी.............तो हे मनु! उठो और महाकाल के बढ़ते उन दूषित कदमों को मोड़ दो! ताकि ब्रह्मदेव की इस अनोखी और अनमोल रचना 'पृथ्वी' की रक्षा हो सके। हाँ डॉक्टर मनु, इसकी रक्षा करो.....रक्षा करो! इसकी रक्षा करो.....!!!
[ डॉक्टर मनु धीरे-धीरे चेहरे से अपने हाथों को हटाते हैं और देर तक एकटक शून्य में देखते रहते हैं। फिर दृढ़ता के साथ अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर कठोर स्वर में कहते हैं]
डॉक्टर मनु - हे परमपिता! मैं वचन देता हूँ, आपकी यह अनुपम-अनमोल रचना युगों-युगों तक जियेगी और यूँ हीं चलती रहेगी। किसी महाविनाश की छाया तक मेैं इसके पास से भी नहीं गुजरने दूँगा। मानवता बारम्बार इसकी रक्षा के लिए बलिदान होती रहेगी, ब्रह्मदेव......(मध्यम पड़ते स्वर में) बलिदान होती रहेगी..........।
पर्दा गिर जाता है।
****
Saturday, 3 July 2021
चिंकू-टू, द फ्लाइंग डिटेक्टिव
Saturday, 12 June 2021
बूढ़ी माई
Friday, 23 June 2017
समय का फेर
समय की विडंबना कहूँ
या कहूँ
काल का ही कोई दुर्योग
गाँव की बीघों जमीन बेचकर
आज शहरों में
गमले सींचते हैं लोग!
खड़ीं रहतीं थीं जिनके द्वारे
छबीले बैलों की जोड़ियाँ
आज पिंजड़ों में
पंछी पालते हैं वही लोग!
कहते हैं,
अब हम बड़े हो गए हैं
मगर बचपन में
जो बेलाभर पीते थे दूध
आज चाय के कप में
सिमट जाते हैं लोग!
चेतना की अलौकिक बेड़ियों में जकड़
सहजीवी थे जो पशु - ओ - मानव
आज निर्जीव यंत्रों में
अपनापन खोजते हैं वही लोग!
***
Thursday, 16 February 2017
संसार सारं(एक प्रयास)
- शून्य क्या है ?
- शून्य शब्द है।
- शब्द क्या है ?
- शब्द ओंकार है।
- ओंकार क्या है ?
- सहस्रदल पद्म का विस्तार ही ओंकार है।
- सहस्रदल पद्म क्या है ?
- विष्णु नाभि का विस्तार सहस्रदल पद्म है।
- विष्णु नाभि क्या है ?
- विष्णु नाभि विष्णु का शक्ति केंद्र है।
- विष्णु क्या है ?
- विष्णु परब्रह्म का एक अंश हैं और सृष्टि का आदि और अंत भी हैं।
- परब्रह्म क्या है ?
- परब्रह्म मानव चेतना से परे है। अर्थात मानव चेतना उसकी व्याख्या नहीं कर सकती। क्योंकि परब्रह्म तक पहुँचकर मानव चेतना उसी में विलीन हो जाती है। सृष्टि के समस्त बंधनों, प्रारब्धों, कर्मों, कर्मफलों से मुक्त होकर ब्रह्ममय होकर उसी की भाँति सर्वव्यापी हो जाती है। यह स्थति प्राप्त करना ही अबतक ज्ञात जीवन का अंतिम लक्ष्य भी है।
Wednesday, 8 February 2017
वास्तविक आयु
एक स्त्री बडी धर्मपरायणा थी। सत्संग करती, साधू-संतों की सच्चे मन से सेवा करती, घर बाहर सभी जगह पूर्णमनोयोग से अपने धर्म का समुचित पालन करती।
एक बार उसके निवास पर कोई महात्मा पधारे। स्त्री के सेवा भाव से महात्मा बडे संतुष्ट हुए। फिर उनकी धर्म-शास्त्रों पर चर्चा होने लगी। स्त्री की विद्वत्तापूर्ण बातें सुनकर महात्मा ने पूछा - पुत्री, तुम्हारी आयु क्या है?
स्त्री- बारह वर्ष, महाराज!
- तुम्हारे पति की?
- जी, दस वर्ष, महाराज!
- और पुत्री, तुम्हारी सास की आयु ?
- महाराज, यही कोई चार वर्ष!
महात्मा (आश्चर्य से) - और पुत्री तुम्हारे ससुर की आयु!?
स्त्री - महारज, वह तो अभी पैदा ही नहीं हुए हैं!
महात्मा चकरा गये। बोले - तुम झूठ तो नहीं बोल सकतीं परंतु यह सब क्या रहस्य है?
तब स्त्री ने उन्हें समझाकर कहा की महाराज इंसान की आयु तो उतनी ही मानने योग्य होती है जितनी वह स्वधर्म पालन और परमार्थ में प्रयोग करे। बाकि जीवन तो बस ईंट-पत्थर और पशु-पक्षियों के समान ही है। जिनके बारे में आपने पूछा वे रिश्ते तो बस हम इंसानों में ही होते है सो मैंने उनकी सच्ची आयु बता दी।
मेरे आने से पूर्व यहां सब धनपशु ही थे। दस वर्ष पूर्व पति ने और चार वर्ष पूर्व सास ने धर्म मार्ग पहचाना और उस पर चलने लगे, तो उतनी ही उनकी आयु मैंने बताई है। ससुर अभी भी वैसे ही धनपशु होकर जी रहे हैं तो मैं उनकी क्या आयु बताऊँ!
Tuesday, 3 January 2017
मानव धर्म का संदेश मानव जाति के नाम
[यहां प्रयुक्त 'सीमा-रेखा' शब्द केवल राष्ट्रों की सीमाओं के लिए नहीं बल्कि धर्म-जाति-संप्रदाय-लिंग आदि की जो रेखाऐं हमनें अपने चारों ओर खींच लीं हैं उन सभी के संदर्भ में है]
ओ! सीमा-रेखा पर लडने वालो
क्या मन में तुमने ठाना है?
खून बहाकर क्या जीतोगे
यह संसार तुम्हारा है!
धरती-अंबर, पर्वत-सागर
सूरज- चाँद-सितरा है,
नदिया-मलयज, कोकिल-शावक
चमन यह कितना प्यारा है!
बैर-भाव गर तुम छोडो
सब कुछ तुम पर वारा है।
मिटा लकीरें एक बनों
बस यह संदेश हमारा है।
रुको जरा ओ रण-दीवानो,
पहले जरा वे लाशें उठा लो
जिनको फिर ना कांधा मिलेगा!
माँ-बहनों के आँसू सुखा दो,
रण-भूमि का सन्नाटा हँसेगा!
जाते-जाते इक बात बता दो,
लहू धरा पर किसका गिरेगा?
नफरत की इस ज्वाला में
चमन बता दो किसका जलेगा!
नहीं विजय किसी को मिलती
बस होती मानवता की हानि है!
जिस मिटटी पर लहू है गिरता
बंजर वह बन जाती है।
भूत-पिशाच उगते हैं उसमें
नहीं रोटी पनप वहां पाती है!
जलजले नित आते उसमे
धरती माँ भी रोती है!
इसी लिए तो प्यारे बंधुओं
बस इतना कहता जाता हूँ,
छोड बंदूकें हल उठाओ
पुनर्नया निर्माण करो तुम
जोतो- खोदो इस धरा को
और सोना उपजाओ तुम
तभी भरेगा पेट सभी का
संग अपनी भूख मिटाओ तुम
नहीं कहता मैं कायर बनकर
जग को खूब हँसाओ तुम
दम है तो निज कर में
सागर से नीर उठाओ तुम
और मस्तक पर धरकर उसको
'पोखरण' में बरसाओ तुम
हरा भरा एक सुंदर आँचल
वसुंधरा को पहनाओ तुम!
भूख-प्यास से लड़ने वाले
हर प्राणि को यूँ सहलाओ तुम
हर चेहरे पर मुस्कान खिले
और संग उनके मुस्काओ तुम
प्रेम भाव की अग्नि दहाकर
खुद उसमें जल जाओ तुम
और प्रहलाद सम निज को तपाकर
सूरज सम चमकाओ तुम!
सीना ताने खडा यह अंबर
भू-चरणों में इसे झुकाओ तुम
सुमेरू गिरि को लेकर फिर से
मंथन अब कर डालो तुम
मिले जो विष-घट अमृत समझ
निज कंठ में उसको धारो तुम
और लेकर अमृत जगत में उसको
यूँ प्रेम सहित बिखराओ तुम
रहे ना द्वेष-ईर्षा इस जग में
ऐसा जहां बनाओ तुम
सत्य-अहिंसा का चोला धर
महा-मानव बन जाओ तुम
तब होवे जयकार तुमहारी
भारती-सुत कहलाओ तुम
भारती-सुत कहलाओ तुम
भारती-सुत कहलाओ तुम..........
Monday, 5 September 2016
-: छ: :-
#आज_का_विचार
कथित आधुनिक विज्ञान इस चराचर सृष्टि को भी कोई फैक्ट्री उत्पाद मानते हुए पृथ्वी और पृथ्वी पर उपस्थित जीवन का प्रतिरूप खोजते भटकता फिर रहा है! ए मूर्ख! (जी हाँ...आज मैं विज्ञान का मानवीकरण करते हुए उसे मूर्ख कहने का दु:साहस कर रहा हूँ) इसी पृथ्वी पर जिसके हजारों वर्षों के मानव इतिहास को तू अपने ही मापदंड़ों पर स्वीकार करता है, उस इतिहास से लेकर मौजूदा संसार में भी जब तुझको किसी एक जीव का भी प्राकृतिक प्रतिरूप नहीं मिलता तो तू किस आधार पर अनंत ब्रह्माण्ड़ में पृथ्वी और पृथ्वीवासी मानव के प्रतिरूप हो सकने की कल्पना कर पाता है!!!
अरे प्रकृति तो रचनाकार है, कोई धनलोलुप व्यवसायी नहीं। जो अपने प्रत्येक आविष्कार/निर्माण को फैक्ट्रियों के हवाले कर धन-मान-यश-अवैध कब्जे जमाने के लिए उनका प्रयोग करे। उसकी प्रत्येक रचना मौलिक है।
अत: कुछ समझना है तो उसके विधान को समझ। बनना है तो उसका सहयोगी बन। करना है तो अपनी चेतना को विकसित कर प्रकृति के साथ साम्य प्राप्त कर। अन्यथा वह तो स्वभाव से बड़ी ही निर्मम रचनाकार है।
Tuesday, 19 January 2016
-: पाँच :-
शिक्षा का उद्देश्य
शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में नैतिक, सामाजिक और व्यवसायिक चेतना विकसित करना होता है।
जो शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति में में इन तीनों चेतनाओं को समानुपात में विकसित करे वह उत्तम,
जो केवल नैतिक और सामाजिक चेतना ही विकसित करे वह मध्यम,और
जो सामाजिक और व्यवसायिक अथवा मात्र व्यवसायिक चेतना तक ही सीमित हो वह शिक्षा व्यवस्था अधम श्रेणी की होती है।
कम से कम आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था तो अंतिम तीसरी श्रेणी में ही आती है।
Saturday, 16 January 2016
-: चार :-
जो त्याज्य हैं उन्हें मोह अथवा अन्य कारणवश प्रेम करना कुप्रेम कहलाता है।
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जो त्याग देने योग्य हैं जैसे मॄतक, अधर्मी, मूर्ख, अपराधी इत्यादि चाहे सगे ही क्यों न हों, त्याग देने ही हितकारी हैं। इन्हें मोहवश या स्वार्थवश चिपटाए रखना या चिपटे रहना कुप्रेम है।
Thursday, 7 January 2016
-: तीन :-
मौन :-
मौन तीन प्रकार का होता है -
प्रथम - ऋषि अर्थात् आत्मचिंतनी मौन - उत्तम।
द्वितीय - कोकिला अर्थात् सामयिक मौन - मध्यम। और
तृतीय - सियार अर्थात् अन्याय समर्थक मौन - अधम।
-: दो:-
रचनाकार को त्रिकालदर्शी होना पहली और अनिवार्य शर्त है। सीमित दृष्टि रखने वाला चाहे जो भी हो सकता है, रचनाकार कभी नहीं।
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त्रिकाल में जिसकी दृष्टि का परास जितना बड़ा होता है वह उतना ही बड़ा रचनाकार कहलाता है।
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'रचनाकर्म' की परास केवल साहित्य तक ही नहीं मानी जानी चाहिए। वास्तु-शिल्प-चित्रकला-अभिनय से लेकर विज्ञान-भाषा-राजनीति-सामाजिकता सब इसी परास में ही आते हैं।
Sunday, 27 December 2015
मुझे भी इंसान बना दे
इक रोज कहा मैंने अपने खुदा से
ए-मालिक सुना है, तू बड़ा चमत्कारी है!
तूने सितारे बनाये हैं,
इक अजूबा चाँद भी बनाया है!
तू मुझे भी इंसान बना दे तो जानूँ
अपने इस जहाँ की सैर करा दे तो जानूँ!
रुह बनकर रहता था मैं उस जमाने में
पड़ा रहता था इक अजब से मयखाने में।
अँधेरा ही अँधेरा था बस वहाँ
इसीलिये मैंने खुदा से कहा-
तनिक अपनी रोशनी मुझे भी दिखा दे तो जानूँ
तू मुझे भी उड़ना सिखा दे तो जानूँ!
खुदा हौले से मुस्कराया
शायद मेरी फरियाद पर उसे थोड़ा रहम आया।
फिर उसने अपना जादुई डंडा घुमाकर
आजाद कर दिया मुझे उस दरिखाने से।
मैं भी निकल पड़ा उस अजूबे जहाँ की सैर करने
मगर इक रोज फिर राह में खुदा मुझे मिल गया।
हाल-चाल पूछा तो यूँ कहने लगा मैं खुदा से-
ए-मालिक! तू तो वाकई बड़ा करामाती है,
तेरे इन चाँद-सितारों का ना कोई सानी है!
मगर मुझे भी एक छोटी सी जमीं बना दे तो जानूँ
मेरा भी इक दिलबर मिला दे तो जानूँ!
खुदा ने गौर से मुझे देखा
शायद मेरी मंशा वह भाँप गया।
फिर जेब से इक गैंद निकाली
और उँगलियों पर नचाकर मेरे पैरों तले छोड़ दी।
छोटे-छोटे कदमों से उसे मैं नापने लगा,
राह में न जाने किस-किस से मिलता बिछुड़ता रहा।
इक रोज यूँ ही चला जा रहा था मैं कुछ सोचते हुए,
कि राह में फिर खुदा दिख गया।
पूछने लगा खुदा मुझे यूँ सोचते देखकर-
मुझे बता मेरे बच्चे, तेरा क्या गम है!
मेरी इस दुनिया में वो क्या चीज कम है
जिसकी वजह से तेरी आँखें आज यूँ नम हैं!
यूँ कहने लगा तब मैं खुदा से-
ए-मालिक! तू बड़ा दरियादिल है!
मैं तेरे इन चाँद-सितारों को लाकर
अपनी इस जमीं को सजाना चाहता हूँ,
इसे जन्नत से भी सुंदर
बनाना चाहता हूँ।
तनिक विज्ञान मुझे दे दे तो जानूँ,
तु मुझ पर मेहरबान हो जाय तो जानूँ!
सुनकर मेरी फरियाद, खुदा थोड़ा चकराया
शायद मेरी अर्ज पर उसे गुस्सा भी आया।
फिर कहने लगा मुझे यूँ समझाकर-
ऐसी जिद्द मत कर ए मेरे नूर-ए-जिगर!
विज्ञान कोई मामूली बच्चों का खिलौना नहीं है,
इसको काबू में रख सके, तुझमें अभी वो धार नहीं है।
बड़ी शिद्दत से बनाया है, मैने इसको अपना गुलाम
वर्ना मिटा डाले यह तो, पल में सारा नाम-ओ-निशां।
मगर मैं,
फिर भी अपनी जिद्द पर अड़ा रहा,
तो जेब से इक डिबिया निकालकर
खुदा यूँ कहने लगा-
जब तक सितारे तुझसे न पूछें टिमटिमाने के वास्ते/
जब तक चाँद तुझसे न पूछे चाँदनी फैलाने के वास्ते/
जब तक बादल तुझसे न माँगें पानी-पीने के वास्ते /
जब तक हवा तुझसे न माँगे आगे बढ़ने के रास्ते /
तब तक ए मेरे बच्चे, इसे रखना यूँ ही सहेज कर
छेड़खानी न करना इसके साथ कभी भूलकर।
डिबिया लेकर मैं ज्यों कुछ कदम आगे बढ़ा
कि मेरे दिल में यह ख्याल आया-
यह विज्ञान दिखता है कैसा, तनिक देखूँ तो उघाड़ कर।
सदियों से पड़ा है बंद, बेसुध होगा या पड़ा होगा अलसाया।
झट से कर दूँगा बंद, गर थोड़ा भी गुर्राया।
ऐसा कर विचार ज्यों ही मैंने ढक्कन थोड़ा सा उठाया,
इक गहरे धुएँ का बादल सा निकलकर बाहर आया।
और छाने लगा मुझपर एक गज़ब का नशा बनकर,
मैं भी झूमने लगा अपनी तमाम सुधबुध खोकर।
और फिर,
और फिर इक दिन जब मुझे होश आया
तो हर तरफ था बस,
लहू-ओ-राख़ के ढ़ेरों का साया।
ना थी वो जन्नत सी जमीं, ना वो चाँद-सितारा
हर तरफ था बस खूँ का मंजर खूँ का नज़ारा।
रूह तक काँप उठी मेरी, देखा जो यह आलम सारा।
रो-रोकर मैंने फिर से खुदा को पुकारा!
यूँ कहने लगा खुदा तब दूर फ़लक पर खड़ा होकर-
ए-मूर्ख क्यूँ रोता है अब आहें भरकर!
कितना समझाया था मैंने तुझे,मगर तूने मेरी इक बात न मानी।
और आज खुद ही लिख डाली, अपनी बरबादी की कहानी।
मैंने तो तुझको बनाया था इंसान
मगर इस विज्ञान ने बना डाला है तुझको हैवान।
अब तो रहम कर ए मेरे रहीम-ओ-रहमान
इक बार फिर बना दे, मुझको तू इंसान!
कर ले कबूल, मेरी यह अंतिम फरियाद
तो मानूँ तुझे, तू है सबका मददगार!
थोड़ा ओर सब्र कर अरे बदनसीब
अंत ही आ पहुँचा तेरा, अब तो तेरे करीब।
ना बची वो जमीं, ना रहा वो आसमाँ
फिर क्या करेगा तू,अब बनकर इंसाँ।
कुछ ही पलों का तो बाकी है अब यह निशां।
तू भी चले आना फिर वहीं,रहता था पहले जहाँ।
दे-देकर दुहाई, हाथ पसारे मैं रोता-गिड़गिड़ाता रहा।
मगर बेरहम खुदा, दूर आसमाँ में जाकर कहीं सो गया।
तब से हर पल मर-मरकर जी रहा हूँ
अपनी लगाई आग में खुद ही जल रहा हूँ।
इक आस बाकी है अभी दिल के किसी कोने में
कि इक दिन आएगा खुदा,मुझपर तरस खाकर
और पकड़ ले जाएगा इसे,
अपने झोले में डालकर।
तब सींचूँगा इस जमीं को
सिर्फ प्रेम के जल से।
रोपूँगा प्रेम के पौधे,
जिनपर मुस्कराएंगीं प्रेम की कलियाँ
प्रेम का गुलाल लेकर।
लहराऐंगीं घटाऐं
प्रेम का आँचल बनकर।
बरसेंगे प्रेम के मोती
और महक उठेंगीं फिज़ाऐं,
प्रेम का श्वास लेकर
प्रेम का श्वास लेकर
प्रेम का श्वास लेकर...............
Sunday, 26 April 2015
खुशियाँ रात मना रहा था 'भारत'
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
गीत खुशी के, गा रहा था भारत
बावन पत्तों में, गाँठ बरस की
झूम-झूमकर, लगा रहा था भारत
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
सपने भोर के, खुलने लगे थे
बिछुड़े रात जो, मिलने लगे थे
नये रंगों में, रंगने लगे थे
उमंगें दिलों में, भरने लगे थे
रजनीगन्धा, कुम्हलाया नहीं था
कमल अभी, मुस्काया नहीं था
खग-कुल चमन में, आया नहीं था
मृग अभी, मस्ताया नहीं था
खुशियाँ मगर, मना रहा था भारत
सपने नये, सजा रहा था भारत
पुष्प-पोटली, बाँध-बाँधकर
तिरंगा ऊँचा, चढ़ा रहा था भारत
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
खींच डोर, तिरंगा फहराया
क्षण-भर था, भारत मुस्काया
मगर, रखा था जो प्रेम-पुष्प
रक्त-पुष्प बन, धरा पर आया
जण-गण-मण, नहीं पड़ा सुनाई
चहुँ ओर से, बस, चीत्कार ही आई
पलभर में, सन्नाटा छाया
महाप्रलय का, ऐसा झोंका आया
राजपथ में, मगर नाच रहा था भारत
तिरंगा किले पर, फहरा रहा था भारत
निज खंड़हर में, दबा-भिंचा
निश्चल पड़ा, कराह रहा था भारत
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
सुनो जरा, ओ सुनने वालों
अब तो जरा तुम, कान लगा लो
जनसंख्या की, इस आँधी को रोको
और आने वाली, नस्लों को बचा लो
कंक्रीट के, इन वनों को काटो
और धरा को, बसंती रंग डालो
ऐसा दिवस, ना देखे भारत
हो सके तो, बस यह वचन उठा लो
ताकि, खुशियाँ रोज मनाये यह भारत
तिरंगा गगन में, फहराये यह भारत
सारी दुनिया, कदम चूमे इसके
इतना नाम, कमाये यह भारत
खुशियाँ रोज, मनाये यह भारत
खुशियाँ रोज, मनाये यह भारत ................
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(ये आर्त उदगार २६ जनवरी २००१ की सुबह गुजरात में आए भीषण भूकंप की त्रासदी से पीड़ित मन में उसी शाम आए थे। नेपाल की विपदा ने पुराने घाव हरे कर दिए)