शिक्षा का उद्देश्य
शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में नैतिक, सामाजिक और व्यवसायिक चेतना विकसित करना होता है।
जो शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति में में इन तीनों चेतनाओं को समानुपात में विकसित करे वह उत्तम,
जो केवल नैतिक और सामाजिक चेतना ही विकसित करे वह मध्यम,और
जो सामाजिक और व्यवसायिक अथवा मात्र व्यवसायिक चेतना तक ही सीमित हो वह शिक्षा व्यवस्था अधम श्रेणी की होती है।
कम से कम आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था तो अंतिम तीसरी श्रेणी में ही आती है।
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Tuesday, 19 January 2016
-: पाँच :-
Saturday, 16 January 2016
-: चार :-
जो त्याज्य हैं उन्हें मोह अथवा अन्य कारणवश प्रेम करना कुप्रेम कहलाता है।
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जो त्याग देने योग्य हैं जैसे मॄतक, अधर्मी, मूर्ख, अपराधी इत्यादि चाहे सगे ही क्यों न हों, त्याग देने ही हितकारी हैं। इन्हें मोहवश या स्वार्थवश चिपटाए रखना या चिपटे रहना कुप्रेम है।
Thursday, 7 January 2016
-: तीन :-
मौन :-
मौन तीन प्रकार का होता है -
प्रथम - ऋषि अर्थात् आत्मचिंतनी मौन - उत्तम।
द्वितीय - कोकिला अर्थात् सामयिक मौन - मध्यम। और
तृतीय - सियार अर्थात् अन्याय समर्थक मौन - अधम।
-: दो:-
रचनाकार को त्रिकालदर्शी होना पहली और अनिवार्य शर्त है। सीमित दृष्टि रखने वाला चाहे जो भी हो सकता है, रचनाकार कभी नहीं।
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त्रिकाल में जिसकी दृष्टि का परास जितना बड़ा होता है वह उतना ही बड़ा रचनाकार कहलाता है।
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'रचनाकर्म' की परास केवल साहित्य तक ही नहीं मानी जानी चाहिए। वास्तु-शिल्प-चित्रकला-अभिनय से लेकर विज्ञान-भाषा-राजनीति-सामाजिकता सब इसी परास में ही आते हैं।
Sunday, 27 December 2015
मुझे भी इंसान बना दे
इक रोज कहा मैंने अपने खुदा से
ए-मालिक सुना है, तू बड़ा चमत्कारी है!
तूने सितारे बनाये हैं,
इक अजूबा चाँद भी बनाया है!
तू मुझे भी इंसान बना दे तो जानूँ
अपने इस जहाँ की सैर करा दे तो जानूँ!
रुह बनकर रहता था मैं उस जमाने में
पड़ा रहता था इक अजब से मयखाने में।
अँधेरा ही अँधेरा था बस वहाँ
इसीलिये मैंने खुदा से कहा-
तनिक अपनी रोशनी मुझे भी दिखा दे तो जानूँ
तू मुझे भी उड़ना सिखा दे तो जानूँ!
खुदा हौले से मुस्कराया
शायद मेरी फरियाद पर उसे थोड़ा रहम आया।
फिर उसने अपना जादुई डंडा घुमाकर
आजाद कर दिया मुझे उस दरिखाने से।
मैं भी निकल पड़ा उस अजूबे जहाँ की सैर करने
मगर इक रोज फिर राह में खुदा मुझे मिल गया।
हाल-चाल पूछा तो यूँ कहने लगा मैं खुदा से-
ए-मालिक! तू तो वाकई बड़ा करामाती है,
तेरे इन चाँद-सितारों का ना कोई सानी है!
मगर मुझे भी एक छोटी सी जमीं बना दे तो जानूँ
मेरा भी इक दिलबर मिला दे तो जानूँ!
खुदा ने गौर से मुझे देखा
शायद मेरी मंशा वह भाँप गया।
फिर जेब से इक गैंद निकाली
और उँगलियों पर नचाकर मेरे पैरों तले छोड़ दी।
छोटे-छोटे कदमों से उसे मैं नापने लगा,
राह में न जाने किस-किस से मिलता बिछुड़ता रहा।
इक रोज यूँ ही चला जा रहा था मैं कुछ सोचते हुए,
कि राह में फिर खुदा दिख गया।
पूछने लगा खुदा मुझे यूँ सोचते देखकर-
मुझे बता मेरे बच्चे, तेरा क्या गम है!
मेरी इस दुनिया में वो क्या चीज कम है
जिसकी वजह से तेरी आँखें आज यूँ नम हैं!
यूँ कहने लगा तब मैं खुदा से-
ए-मालिक! तू बड़ा दरियादिल है!
मैं तेरे इन चाँद-सितारों को लाकर
अपनी इस जमीं को सजाना चाहता हूँ,
इसे जन्नत से भी सुंदर
बनाना चाहता हूँ।
तनिक विज्ञान मुझे दे दे तो जानूँ,
तु मुझ पर मेहरबान हो जाय तो जानूँ!
सुनकर मेरी फरियाद, खुदा थोड़ा चकराया
शायद मेरी अर्ज पर उसे गुस्सा भी आया।
फिर कहने लगा मुझे यूँ समझाकर-
ऐसी जिद्द मत कर ए मेरे नूर-ए-जिगर!
विज्ञान कोई मामूली बच्चों का खिलौना नहीं है,
इसको काबू में रख सके, तुझमें अभी वो धार नहीं है।
बड़ी शिद्दत से बनाया है, मैने इसको अपना गुलाम
वर्ना मिटा डाले यह तो, पल में सारा नाम-ओ-निशां।
मगर मैं,
फिर भी अपनी जिद्द पर अड़ा रहा,
तो जेब से इक डिबिया निकालकर
खुदा यूँ कहने लगा-
जब तक सितारे तुझसे न पूछें टिमटिमाने के वास्ते/
जब तक चाँद तुझसे न पूछे चाँदनी फैलाने के वास्ते/
जब तक बादल तुझसे न माँगें पानी-पीने के वास्ते /
जब तक हवा तुझसे न माँगे आगे बढ़ने के रास्ते /
तब तक ए मेरे बच्चे, इसे रखना यूँ ही सहेज कर
छेड़खानी न करना इसके साथ कभी भूलकर।
डिबिया लेकर मैं ज्यों कुछ कदम आगे बढ़ा
कि मेरे दिल में यह ख्याल आया-
यह विज्ञान दिखता है कैसा, तनिक देखूँ तो उघाड़ कर।
सदियों से पड़ा है बंद, बेसुध होगा या पड़ा होगा अलसाया।
झट से कर दूँगा बंद, गर थोड़ा भी गुर्राया।
ऐसा कर विचार ज्यों ही मैंने ढक्कन थोड़ा सा उठाया,
इक गहरे धुएँ का बादल सा निकलकर बाहर आया।
और छाने लगा मुझपर एक गज़ब का नशा बनकर,
मैं भी झूमने लगा अपनी तमाम सुधबुध खोकर।
और फिर,
और फिर इक दिन जब मुझे होश आया
तो हर तरफ था बस,
लहू-ओ-राख़ के ढ़ेरों का साया।
ना थी वो जन्नत सी जमीं, ना वो चाँद-सितारा
हर तरफ था बस खूँ का मंजर खूँ का नज़ारा।
रूह तक काँप उठी मेरी, देखा जो यह आलम सारा।
रो-रोकर मैंने फिर से खुदा को पुकारा!
यूँ कहने लगा खुदा तब दूर फ़लक पर खड़ा होकर-
ए-मूर्ख क्यूँ रोता है अब आहें भरकर!
कितना समझाया था मैंने तुझे,मगर तूने मेरी इक बात न मानी।
और आज खुद ही लिख डाली, अपनी बरबादी की कहानी।
मैंने तो तुझको बनाया था इंसान
मगर इस विज्ञान ने बना डाला है तुझको हैवान।
अब तो रहम कर ए मेरे रहीम-ओ-रहमान
इक बार फिर बना दे, मुझको तू इंसान!
कर ले कबूल, मेरी यह अंतिम फरियाद
तो मानूँ तुझे, तू है सबका मददगार!
थोड़ा ओर सब्र कर अरे बदनसीब
अंत ही आ पहुँचा तेरा, अब तो तेरे करीब।
ना बची वो जमीं, ना रहा वो आसमाँ
फिर क्या करेगा तू,अब बनकर इंसाँ।
कुछ ही पलों का तो बाकी है अब यह निशां।
तू भी चले आना फिर वहीं,रहता था पहले जहाँ।
दे-देकर दुहाई, हाथ पसारे मैं रोता-गिड़गिड़ाता रहा।
मगर बेरहम खुदा, दूर आसमाँ में जाकर कहीं सो गया।
तब से हर पल मर-मरकर जी रहा हूँ
अपनी लगाई आग में खुद ही जल रहा हूँ।
इक आस बाकी है अभी दिल के किसी कोने में
कि इक दिन आएगा खुदा,मुझपर तरस खाकर
और पकड़ ले जाएगा इसे,
अपने झोले में डालकर।
तब सींचूँगा इस जमीं को
सिर्फ प्रेम के जल से।
रोपूँगा प्रेम के पौधे,
जिनपर मुस्कराएंगीं प्रेम की कलियाँ
प्रेम का गुलाल लेकर।
लहराऐंगीं घटाऐं
प्रेम का आँचल बनकर।
बरसेंगे प्रेम के मोती
और महक उठेंगीं फिज़ाऐं,
प्रेम का श्वास लेकर
प्रेम का श्वास लेकर
प्रेम का श्वास लेकर...............
Sunday, 26 April 2015
खुशियाँ रात मना रहा था 'भारत'
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
गीत खुशी के, गा रहा था भारत
बावन पत्तों में, गाँठ बरस की
झूम-झूमकर, लगा रहा था भारत
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
सपने भोर के, खुलने लगे थे
बिछुड़े रात जो, मिलने लगे थे
नये रंगों में, रंगने लगे थे
उमंगें दिलों में, भरने लगे थे
रजनीगन्धा, कुम्हलाया नहीं था
कमल अभी, मुस्काया नहीं था
खग-कुल चमन में, आया नहीं था
मृग अभी, मस्ताया नहीं था
खुशियाँ मगर, मना रहा था भारत
सपने नये, सजा रहा था भारत
पुष्प-पोटली, बाँध-बाँधकर
तिरंगा ऊँचा, चढ़ा रहा था भारत
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
खींच डोर, तिरंगा फहराया
क्षण-भर था, भारत मुस्काया
मगर, रखा था जो प्रेम-पुष्प
रक्त-पुष्प बन, धरा पर आया
जण-गण-मण, नहीं पड़ा सुनाई
चहुँ ओर से, बस, चीत्कार ही आई
पलभर में, सन्नाटा छाया
महाप्रलय का, ऐसा झोंका आया
राजपथ में, मगर नाच रहा था भारत
तिरंगा किले पर, फहरा रहा था भारत
निज खंड़हर में, दबा-भिंचा
निश्चल पड़ा, कराह रहा था भारत
खुशियाँ रात, मना रहा था भारत
सुनो जरा, ओ सुनने वालों
अब तो जरा तुम, कान लगा लो
जनसंख्या की, इस आँधी को रोको
और आने वाली, नस्लों को बचा लो
कंक्रीट के, इन वनों को काटो
और धरा को, बसंती रंग डालो
ऐसा दिवस, ना देखे भारत
हो सके तो, बस यह वचन उठा लो
ताकि, खुशियाँ रोज मनाये यह भारत
तिरंगा गगन में, फहराये यह भारत
सारी दुनिया, कदम चूमे इसके
इतना नाम, कमाये यह भारत
खुशियाँ रोज, मनाये यह भारत
खुशियाँ रोज, मनाये यह भारत ................
.
(ये आर्त उदगार २६ जनवरी २००१ की सुबह गुजरात में आए भीषण भूकंप की त्रासदी से पीड़ित मन में उसी शाम आए थे। नेपाल की विपदा ने पुराने घाव हरे कर दिए)
Tuesday, 3 February 2015
-: एक :-
मानव सभ्यता के इतिहास में संभवतः प्रकृति को मानव की ओर से मिलने वाला अंतिम "अंशदान" था "मानव मल"।
परंतु आधुनिक होती मानवता ने उसे भी कंक्रीट के खाँचों में बाँधकर प्रकृति को उससे भी वंचित कर दिया है।
आगे अब मानव प्रकृति का सिर्फ और सिर्फ दोहन करेगा।