Saturday, 12 June 2021

बूढ़ी माई

दूर विशाल महासागर के बीच एक छोटा सा किन्तु बड़ा ही शान्त और रमणीक टापू था। पूरा टापू अनेक प्रकार के सुंदर हरे-भरे पेड़-पौधों से भरा हुआ था। जिनके फलों और फूलों की मन को मुग्ध कर देने वाली सुगन्ध सदैव चारों ओर फैली रहती थी। टापू पर बीचो-बीच एक छोटा सा मीठे पानी का तालाब था। जो सदैव स्वच्छ जल से लबालब भरा रहता था।

पक्षी तो वहाँ अनेक प्रकार के उड़ते तथा कलरव किया करते थे परन्तु पशुओं में केवल कुछ हाथी, बन्दर और गाय ही दिखाई पड़ती थीं। इन सब की कुल संख्या भी मात्र कुछ सौ के लगभग ही थी। सभी के बीच असीम प्रेम था। सभी एक दूसरे के सहायता के लिए सदैव जान पर खेलने के लिए तत्पर रहते थे। शायद यह बात सभी ने अच्छी तरह समझ ली थी कि अब उन सभी का उस छोटे से टापू पर ही साथ-साथ रहना भी है और मरना भी......तो फिर क्यों ना जब तक जीवित हैं, हिल-मिलकर प्रेम से जियें। क्योंकि टापू के चारो ओर दूर क्षितिज तक केवल पानी ही पानी दिखाई पड़ता था। 

टापू पर अधिकान्शतः वर्षा का मौसम रहता था। वर्षा भी विचित्र ही होती थी। न बादल न बादलों की गरज और न बिजली की चमक....बस खिली धूप में अचानक पानी बरसा पड़ता.....और केवल पानी ही नहीं, कई बार तो पानी के साथ-साथ बड़े बड़े शंख, बहुमूल्य मोती, सीपी, घोंघे और जीवित मछलियाँ भी बरस पड़तीं। होता यह था कि जब दूर क्षितिज के पास से आकाश को छूती कोई लहर समुद्र में उठती तो मार्ग में अचानक आये टापू से टकराकर तेजी से ऊपर उठती और अपने साथ लायी हुई सभी वस्तुओं के साथ टापू पर ही बरस पड़ती। 

इन सभी पशु-पक्षियों के साथ-साथ एक वृद्धा भी वहाँ रहती थी। चाँदी के समान चमकते सफेद बाल, दूध जैसे सफेद, हाथ के बुने रेशमी वस्त्र पहने वह अधिकतर तालाब के पास अपनी सुन्दर झोपड़ी के बाहर चरखा कातने में व्यस्त रहती थी। साथ ही एक गीत भी गुनगुनाती रहती थी -

- "चल-चल रे चरखवा तू शोर न मचा,
   अभी-अभी सोया है मेरा मुन्ना राजा,
   जागेगा तो रोएगा और होयेगा खफा,
   शामत तेरी आएगी बचकर जाएगा कहाँ........"

जब वह अपना चरखा चलाती तो शंख सीप और मोती जड़े उसके विचित्र चरखे से एक प्रकार का मधुर संगीत निकलता था, जिसे सुनकर टापू के अनेक पशु-पक्षी आकर उसके पास जमा हो जाया करते थे तथा घंटो-घंटो मंत्रमुग्ध से बैठकर उसका वह गीत और चरखे का मधुर संगीत सुनते रहते। 

ये सभी पशु इस वीरान टापू पर कब और किस प्रकार पहुँचे यह तो कोई नहीं जानता परन्तु यह वृद्धा यहाँ किस प्रकार पहुंची, उसका एक दुखद वृत्तान्त है - 

लगभग तीस वर्ष पूर्व सभी प्रकार से सम्पन्न उसका हँसता-खेलता छोटा सा परिवार था। जिसमें उसका पति, पाँच वर्षीया बेटी और एक वर्षीय बेटा सम्मलित थे। उनका अपना काफी लम्बा-चौड़ा व्यापार था। फिर भी जब कभी समय मिलता, वे अपने छोटे से जहाज को लेकर समुद्र में दूर तक घूमने जाया करते थे। आसपास के टापूओं पर घूमते, जहाँ कई बार उन्हें प्रकृति की ओर से अनेक बहुमूल्य और सुंदर उपहार भी प्राप्त हो जाते।

उस दिन जब वे अपने उस दूध मुँहे बेटे को घर छोड़ कर समुद्र भ्रमण के लिए निकले तो मौसम बिल्कुल शान्त था। सुनहरी धूप खिली थी। धीमी-धीमी मदमस्त हवा के झोंके हृदय में नई उमंगे भर रहे थे। चमचमाती लहरों पर मछलियाँ नृत्य करती सी प्रतीत होती थीं। कुछ ही देर में उनका जहाज समुद्र में काफी दूर निकल आया तो वे डेक पर आ गए। गुलाबी फ्रॉक पहने उनकी बेटी खुशी से उछलती-कूदती किसी नन्ही परी जैसी लग रही थी तथा वे दोनों उसे देख-देखकर मन ही मन मुग्ध रहे थे।

अचानक चारों को एक अजीब सा सन्नाटा छाने लगा। बच्ची भी सुस्त होकर माँ की गोद में आ बैठी। पानी में मछलियाँ लुप्त हो गईं। सुनहरी धूप में कुछ कालिमा सी छाने लगी। हवाएं भी तीखी अनुभव होने लगीं। देखते ही देखते आकाश में काले-काले बादल घुमड़ने लगे। उन्होंने जल्दी से जहाज को वापस मोड़ा, परन्तु तीखी हवाओं ने कुछ ही देर में भयानक रूप धारण कर लिया। आकाश में बादल गरजने लगे और वे किनारे से अभी बहुत दूर थे। तभी उन्हें एक छोटा टापू दिखाई दिया तो उन्होंने शरण लेने के लिए जहाज को उधर ही बढा दिया। परन्तु टापू तक पहुँचने से पहले ही उनका जहाज एक भयानक चक्रवात में घिरकर नियंत्रण खो बैठा और फिर ऊँची-ऊँची लहरों पर उछलते-गिरते एक अपरिचित मार्ग पर बढ़ने लगा।
 
कई घंटे तक इसी प्रकार लहरों पर गिरते-पड़ते जहाज अचानक धमाके की आवाज के साथ किसी चट्टान से टकराया और जहाज के टुकड़ों के साथ-साथ वे भी दूर तक छिटक गये। 

काफी देर बाद जब उसे चेतना आयी तो उसने स्वयं को घास पर लेटे पाया। अंग-अंग में भयंकर पीड़ा हो रही थी। आसमान बिल्कुल साफ था। चारों ओर असीम निस्तब्धता छायी थी। तभी उसे बेटी और पति की याद आई तो वह झटके से उठ बैठी। चारों ओर एक विचित्र ही दृश्य था। अनेको पशु-पक्षी आँखों में गहरी सम्वेदना लिए हुए चारों ओर शोकाकुल से बैठे थे। उसे जीवित देखकर उनमें थोड़ी हलचल हुई। पास ही खड़े हाथियों ने एक दूसरे को सूँड से छुआ और फिर सूँड उठाकर अभिवादन किया। तभी उसकी दृष्टि खून में लथपथ पड़े पति पर पड़ी तो वह चीत्कार करते हुए उससे चिपट गई। उसे हिलाया डुलाया किन्तु उसमे जीवन का कोई चिन्ह नहीं था। तभी उसने देखा कि एक हाथी सूँड में उसकी नन्ही बेटी को उठाये तट की ओर से दौड़ा आ रहा है। लड़खड़ाती हुई वह उसकी और दौड़ी। काफी हिलाया-डुलाया, पेट दबा-दबा कर पानी निकाला परन्तु उसकी भी साँसे नहीं लौटीं तो वह फिर अचेत होकर वहीं लुढ़क गई।

कुछ देर बाद उसे फिर होश आया तो एक वृद्ध बन्दरिया कन्धे के पास बैठी धीरे-धीरे उसके बालों में उँगलियाँ चला रही थी। पास ही बैठी एक गाय रह-रहकर उसके पैरों को चाट रही थी। तो एक तोता उसके वक्ष पर उचक-उचक कर मुन्ना-मुन्ना की टेर लगा रहा था। शायद अचेतावस्था में वह मुन्ना-मुन्ना कहकर बड़बड़ा रही थी। उसी की नकल से उस तोते ने भी मुन्ना कहना सीख लिया था। अनेक हाथियों ने मिलकर जहाज के लगभग सारे अवशेष को टापू पर खींच लिया था। दूसरे अनेक पशु-पक्षी भी इधर उधर खड़े शायद उसकी चेतना लौटने की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके उस आगाध और निस्वार्थ प्रेम को देखकर एक पल के लिए वह अपना सारा दुःख भूल गई परन्तु अगले ही पल फिर से घुटनों में मुँह छुपा कर फूट-फूट कर रोने लगी। चारों ओर निराशा भरे सागर में इन अबोल जीवों का निश्छल प्रेम ही उसको डूबने से बार-बार रोक रहा था। बेटी व पति का अन्तिम संस्कार करने के बाद भी कई दिनों तक वह यूँ ही अर्द्धविक्षिप्त सी बैठी रोती रहती। 

महीनों बीत गए परन्तु वह सुबह से शाम तक गुमसुम तट पर बैठी इसी आशा में सागर को निहारती रहती कि कोई जहाज या नौका उधर से निकले तो वह अपने बच्चे के पास वापस लौट सके। सोते-जागते वह जहाँ भी रहती अनेक पशु-पक्षी उसके इर्द-गिर्द ही मँडराते रहते। मानो उसकी रखवाली में जुटे हों। कभी नारियल-कन्द-मूल-फल लाकर उसके पास रख देते तो कभी तरह तरह की चेष्टायें करके उसका ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास करते रहते। उस दिन नट्टू बंदर के दोनों छोटे-छोटे बच्चों की नटखट कलाबाजियाँ देखकर वह अचानक जोर से खिलखिला उठी तो मानो वर्षों से बन्द पड़े किसी मन्दिर में अचानक सैकड़ों घंटे बजे उठे हों। पास ही चर रहीं गायें जोर से रम्भा उठों। दो-तीन हाथी जोकि पास मँडरा रहे थे खुशी के मारे सूँड उठाकर जोर से चिंघाड़े तो अगले ही क्षण टापू के दूसरे छोर से उसका प्रत्युत्तर भी आ गया.......और कुछ ही देर में टापू के समस्त पशु-पक्षी वहीं एकत्र हो गए। 

भावविभोर होकर उसने उन्हें प्यार से पुचकारा तो एक हाथी ने किसी कोमल फूल की भाँति उसे सूँड में  लपेटकर उठाया और पीठ पर बैठा लिया। फिर मस्त मतवाली चाल बना कर ले चला उसे टापू की सैर कराने। साथ-साथ पूरा टापूवासी समुदाय भी हर्ष ध्वनि करते हुए चल रहा था।

दिनभर टापू पर घूमने के बाद उन्होंने तालाब के किनारे पड़ाव डाला। तब सभी ने अपनी-अपनी रुचि के स्वादिष्ट कन्दमूल-फल लाकर उसके आगे ढेर लगा दिया। उनके इस आत्मीयता भरे व्यवहार ने आज उसकी चिन्तन धारा को पूरी तरह मोड़ दिया। उसे लगा कि इतने समय से वह व्यर्थ ही अपने परिवार के वियोग में घुल रही थी। उस छोटे से परिवार को खोकर उसने तो इतने बड़े परिवार को पा लिया था। जिनके हृदय में निश्छल प्रेम के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं......। 

बस यहीं से आरम्भ हुआ उद्योग का एक नया पर्व.......जहाज के अवशेष से आवश्यकता का सामान चुना गया तथा तालाब के किनारे एक सुन्दर कुटिया तैयार हो गई। टापू पर हजारों की संख्या में फैले शहतूत के पेड़ों पर ढेर के ढेर रेशम के कोकून लटके थे। उन्हें एकत्र कर कातने के लिए एक चरखा बनाया गया। बहुमूल्य शंख, सीप और मोती जड़े रेशमी पर्दों व गद्दों से सजी उसकी कुटिया किसी महारानी के शयनगार से कम न थी।

फिर तो मानो समय को पंख लग गए। कई तोतों को उसने "माँ" बोलना सिखाना चाहा परन्तु वे "माई" कहने लगे। तीस वर्षों का लम्बा समय यूँ ही हँसते-गुनगुनाते गुजर गया। परन्तु उस रात मानो प्रलय ही आ आयी हो। शाम से ही आकाश काले-काले बादलों से पट गया था। सारी रात गरज-चमक भरा चक्रवात टापू को कम्पित करता रहा। कई हाथी रात भर बूढ़ी माई की कुटिया को घेरे खड़े रहे। मानो उसमें कोई अमूल्य कोष रखा था। जिसकी उन्हें इस भयंकर चक्रवात से रक्षा करनी थी।

भोर हुई तो चारों असीम शान्ति थी। आकाश बिल्कुल स्वच्छ था। जैसे कुछ हुआ ही न था। तभी पश्चिमी तट की ओर से एक हाथी की चिंघाड़ सुनाई दी और तुरन्त ही सब के सब उधर ही दौड़ पड़े। वह भी एक हाथी पर सवार होकर वहाँ पहुँची तो देखा कि सैनिक वेश में एक व्यक्ति लाइफ जैकेट में लिपटा पड़ा है। हिलाया-डुलाया, अभी साँसे शेष थीं। पेट से पानी आदि निकाला व जल्दी से एक जड़ी-बूटी लाकर उपचार किया। शीघ्र ही नाड़ी पलटने लगी।

- "मैं कहाँ हूँ......!?' चेतना आने पर उसने वहाँ का विचित्र दृश्य देखा तो अनायास ही यह प्रश्न उसके मुख से निकल पड़ा।

- "तुम जहाँ भी हो, अब सुरक्षित हो बेटा!" बूढ़ी माई ने उसे दुलारते हुए कहा।

- "परन्तु आप कौन हैं? और क्या सचमुच आप यहाँ इन सब के बीच अकेली ही है!?" 

वहाँ के उस विचित्र दृश्य से आश्चर्यचकित होते हुए उसने पुनः प्रश्न किया तो बूढ़ी माई ने आदि से अंत तक अपनी पूरी कहानी उसे सुना दी। जिसे सुनकर उसका सैनिक हृदय भी दहल गया। तब उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह एक सैनिक है और एक छोटे सैन्य जहाज पर अपने साथियों के साथ काम पर निकला था। तभी रात के इस भीषण चक्रवात में घिर कर उनका जहाज डूब गया और चक्रवाती लहरों ने उसे उठाकर इस टापू पर पटक दिया है।

इसके पश्चात उसका जमकर आतिथ्य सत्कार हुआ। फिर एक छोटी नौका बनाई गई तथा लगभग सप्ताह भर की खाद्य सामग्री के साथ ढेरों बहुमूल्य उपहार देकर उसे उसके देश विदा किया गया। सैनिक के बहुत आग्रह करने के उपरन्त भी जब बूढ़ी माई ने टापू छोड़ने से साफ मना कर दिया तो वह उसके बिछुड़े बेटे को शीघ्र मिलाने का वचन देकर लौट गया।

इस घटना के लगभग एक माह बाद एक दिन अचानक टापू पर कोहराम सा मच गया। एक-एक करके सभी पशु-पक्षी बूढ़ी माई की कुटिया के आसपास एकत्र होने लगे। कारण जानने के लिए वह बाहर आई तो सभी ने उसे भीतर धकेल दिया। कुछ देर बाद उसने देखा कि वही सैनिक दस-बारह लोगों के साथ पुनः लौट आया है। उसके वक्ष में अचानक एक विचित्र सी बेचैनी होने लगी। ह्रदय जोर-जोर से धड़कने लगा। वह कुटिया के बाहर खड़ी उन सभी के बीच अपने नन्हे-मुन्ने बेटे को खोज रही थी। उसे आशा थी कि एक दिन वह सैनिक उसके बच्चे को लेकर अवश्य लौटेगा। तब वह अपने नन्हे-नन्हे पैरों से छमछम करता हुआ आएगा और "माँ माँ" कह कर उससे चिपट जाएगा। परन्तु वह तो इनके साथ नहीं है! फिर यह सैनिक इन सब को क्यों लेकर आ रहा है!! 

वह खड़ी यही सोच विचार कर रही थी कि तभी उसके कानों में मिश्री से मधुर स्वर सुनाई दिया, "माँ......"
तो वह झट से घूम कर पीछे-दाएँ-बाएँ मुन्ना-मुन्ना कहते हुए उसे ढूँढने लगी। तब सैनिक ने उसके कन्धे पकड़कर एक प्रौढ़ व्यक्ति की ओर संकेत करते हुए प्यार से कहा, "माँजी, आपका मुन्ना वहाँ नहीं, यह है। अब ये बड़ा हो चुका है। 

वृद्धा ने नजर उठा कर सामने खड़े व्यक्ति को देखा, वह बाहें फैलाए "माँ माँ...." पुकार रहा था।

वृद्धा ने अपने हाथों से धीरे से उसके चेहरे पर छुआ, आँखों को परखा, बदन पर हाथ फेरा और फिर जोर से "मुन्ना....मेरा बच्चा!!!" कहते हुए छाती से चिपका लिया। 

काफी देर बाद वात्शल्य का उमड़ता सागर थमा तो बूढ़ी माई के सभी सेवक अतिथियों के सत्कार में जुट गए। परन्तु एक मूक उदाशी के साथ।

खाना-पीना समाप्त हुआ तो सभी लोग बूढ़ी माई का सामान समेटने लगे।

- "यह क्या कर रहे हो तुम लोग?" बूढ़ी माई ने रुष्ट होते हुए पूछा।

- "क्यों, ये सब क्या साथ नहीं ले चलना है, माँ?"

- "साथ!!!....परन्तु कहाँ?!"

- 'हमारे साथ माँ, अपने घर...."

- "किन्तु मेरा घर तो यह टापू ही है। अब मैं इसे नहीं छोड़ सकती।"

- "नहीं माँ....मैं अब आपको इस जंगल में अकेले नहीं रहने दे सकता।"

- "नहीं बेटा....मैं अकेली कहाँ हूँ.....यहाँ तो मेरे इतने सारे बच्चे हैं और तू इसे जंगल बता रहा है!!!..."

- "ठीक है माँ, मैं इन सब को भी साथ ले जाऊँगा.....।

- "इन सबको!!!....ये पेड़, ये पौधे, ये मैदान, पहाड़ी, झरना....इन सबको कैसे और क्या-क्या ले जाएगा तू......ये सभी तो आपस में गुँथे पड़े हैं। इनमें से कोई एक भी बिछुड़ गया तो सारे मिट जाएंगे......।" 

बहुत समझाने-बुझाने के उपरन्त भी जब बूढ़ी माई ने टापू को छोड़ना स्वीकार न किया तो सभी ने वहीं धरना दे दिया। कई दिन तक एक दूसरे को मनाने के प्रयास चलते रहे। परन्तु अंत में सभी को बूढ़ी माई की इच्छा के आगे झुकना पड़ा। फिर सबने अनावश्यक परिश्रम न करने का आदेशात्मक सा निर्देश दिया तथा वस्त्र-भोजन आदि आवश्यकताओं का सभी सामान वहीं पहुँचाते रहने का संकल्प कर अश्रुपूरित विदाई ली। 

अपने सभी बच्चों के साथ तट पर खड़ी वह तब तक उनके जहाज को निहारती रही जब तक वह आँखों से ओझल न हो गया। कुछ देर बाद फिर से टापू पर उसका वही गीत व चरखे का मधुर संगीत गूँजने लगा -

"चल-चल रे चरखवा तू शोर न मचा,
 अभी-अभी लौटा है मेरा मुन्ना राजा,
 आएगा तो रोएगा और होएगा खफा,
 मुश्किल मेरी आएगी, कैसे मनाऊँगी बता......।"

Friday, 23 June 2017

समय का फेर

समय की विडंबना कहूँ
या कहूँ
काल का ही कोई दुर्योग
गाँव की बीघों जमीन बेचकर
आज शहरों में
गमले सींचते हैं लोग!

खड़ीं रहतीं थीं जिनके द्वारे
छबीले बैलों की जोड़ियाँ
आज पिंजड़ों में
पंछी पालते हैं वही लोग!

कहते हैं,
अब हम बड़े हो गए हैं
मगर बचपन में
जो बेलाभर पीते थे दूध
आज चाय के कप में
सिमट जाते हैं लोग!

चेतना की अलौकिक बेड़ियों में जकड़
सहजीवी थे जो पशु - ओ - मानव
आज निर्जीव यंत्रों में
अपनापन खोजते हैं वही लोग!

                ***

Thursday, 16 February 2017

संसार सारं(एक प्रयास)

- शून्य क्या है ?

- शून्य शब्द है।

- शब्द क्या है ?

- शब्द ओंकार है।

- ओंकार क्या है ?

- सहस्रदल पद्म का विस्तार ही ओंकार है।

- सहस्रदल पद्म क्या है ?

- विष्णु नाभि का विस्तार सहस्रदल पद्म है।

- विष्णु नाभि क्या है ?

- विष्णु नाभि विष्णु का शक्ति केंद्र है।

- विष्णु क्या है ?

- विष्णु परब्रह्म का एक अंश हैं और सृष्टि का आदि और अंत भी हैं।

- परब्रह्म क्या है ?

- परब्रह्म मानव चेतना से परे है। अर्थात मानव चेतना उसकी व्याख्या नहीं कर सकती। क्योंकि परब्रह्म तक पहुँचकर मानव चेतना उसी में विलीन हो जाती है। सृष्टि के समस्त बंधनों, प्रारब्धों, कर्मों, कर्मफलों से मुक्त होकर ब्रह्ममय होकर उसी की भाँति सर्वव्यापी हो जाती है। यह स्थति प्राप्त करना ही अबतक ज्ञात जीवन का अंतिम लक्ष्य भी है।


Wednesday, 8 February 2017

वास्तविक आयु

एक स्त्री बडी धर्मपरायणा थी। सत्संग करती, साधू-संतों की सच्चे मन से सेवा करती, घर बाहर सभी जगह पूर्णमनोयोग से अपने धर्म का समुचित पालन करती।

एक बार उसके निवास पर कोई महात्मा पधारे। स्त्री के सेवा भाव से महात्मा बडे संतुष्ट  हुए। फिर उनकी धर्म-शास्त्रों पर चर्चा होने लगी। स्त्री की विद्वत्तापूर्ण बातें सुनकर महात्मा ने पूछा - पुत्री, तुम्हारी आयु क्या है?

स्त्री- बारह वर्ष, महाराज!

- तुम्हारे पति की?

- जी, दस वर्ष, महाराज!

- और पुत्री, तुम्हारी सास की आयु ?

- महाराज, यही कोई चार वर्ष!

महात्मा (आश्चर्य से) - और पुत्री तुम्हारे ससुर की आयु!?

स्त्री - महारज, वह तो अभी पैदा ही नहीं हुए हैं!

महात्मा चकरा गये। बोले - तुम झूठ तो नहीं बोल सकतीं परंतु यह सब क्या रहस्य है?

तब स्त्री ने उन्हें समझाकर कहा की महाराज इंसान की आयु तो उतनी ही मानने योग्य होती है जितनी वह स्वधर्म पालन और परमार्थ में प्रयोग करे। बाकि जीवन तो बस ईंट-पत्थर और पशु-पक्षियों के समान ही है। जिनके बारे में आपने पूछा वे रिश्ते तो बस हम इंसानों में ही होते है सो मैंने उनकी सच्ची आयु बता दी।

मेरे आने से पूर्व यहां सब धनपशु ही थे। दस वर्ष पूर्व पति ने और चार वर्ष पूर्व सास ने धर्म मार्ग पहचाना और उस पर चलने लगे, तो उतनी ही उनकी आयु मैंने बताई है। ससुर अभी भी वैसे ही धनपशु होकर जी रहे हैं तो मैं उनकी क्या आयु बताऊँ!


Tuesday, 3 January 2017

मानव धर्म का संदेश मानव जाति के नाम

[यहां प्रयुक्त 'सीमा-रेखा' शब्द केवल राष्ट्रों की सीमाओं के लिए नहीं बल्कि धर्म-जाति-संप्रदाय-लिंग आदि की जो रेखाऐं हमनें अपने चारों ओर खींच लीं हैं उन सभी के संदर्भ में है]

ओ! सीमा-रेखा पर लडने वालो
क्या मन में तुमने ठाना है?
खून बहाकर क्या जीतोगे
यह संसार तुम्हारा है!
धरती-अंबर, पर्वत-सागर
सूरज- चाँद-सितरा है,
नदिया-मलयज, कोकिल-शावक
चमन यह कितना प्यारा है!
बैर-भाव गर तुम छोडो
सब कुछ तुम पर वारा है।
मिटा लकीरें एक बनों
बस यह संदेश हमारा है।

रुको जरा ओ रण-दीवानो,
पहले जरा वे लाशें उठा लो
जिनको फिर ना कांधा मिलेगा!
माँ-बहनों के आँसू सुखा दो,
रण-भूमि का सन्नाटा हँसेगा!
जाते-जाते इक बात बता दो,
लहू धरा पर किसका गिरेगा?
नफरत की इस ज्वाला में
चमन बता दो किसका जलेगा!

नहीं विजय किसी को मिलती
बस होती मानवता की हानि है!
जिस मिटटी पर लहू है गिरता
बंजर वह बन जाती है।
भूत-पिशाच उगते हैं उसमें
नहीं रोटी पनप वहां पाती है!
जलजले नित आते उसमे
धरती माँ भी रोती है!

इसी लिए तो प्यारे बंधुओं
बस इतना कहता जाता हूँ,
छोड बंदूकें हल उठाओ
पुनर्नया निर्माण करो तुम
जोतो- खोदो इस धरा को
और सोना उपजाओ तुम
तभी भरेगा पेट सभी का
संग अपनी भूख मिटाओ तुम

नहीं कहता मैं कायर बनकर
जग को खूब हँसाओ तुम
दम है तो निज कर में
सागर से नीर उठाओ तुम
और मस्तक पर धरकर उसको
'पोखरण' में बरसाओ तुम
हरा भरा एक सुंदर आँचल
वसुंधरा को पहनाओ तुम!

भूख-प्यास से लड़ने वाले
हर प्राणि को यूँ सहलाओ तुम
हर चेहरे पर मुस्कान खिले
और संग उनके मुस्काओ तुम
प्रेम भाव की अग्नि दहाकर
खुद उसमें जल जाओ तुम
और प्रहलाद सम निज को तपाकर
सूरज सम चमकाओ तुम!

सीना ताने खडा यह अंबर
भू-चरणों में इसे झुकाओ तुम
सुमेरू गिरि को लेकर फिर से
मंथन अब कर डालो तुम
मिले जो विष-घट अमृत समझ
निज कंठ में उसको धारो तुम
और लेकर अमृत जगत में उसको
यूँ प्रेम सहित बिखराओ तुम
रहे ना द्वेष-ईर्षा इस जग में
ऐसा जहां बनाओ तुम
सत्य-अहिंसा का चोला धर
महा-मानव बन जाओ तुम
तब होवे जयकार तुमहारी
भारती-सुत कहलाओ तुम
भारती-सुत कहलाओ तुम
भारती-सुत कहलाओ तुम..........


Monday, 5 September 2016

-: छ: :-

#आज_का_विचार

कथित आधुनिक विज्ञान इस चराचर सृष्टि को भी कोई फैक्ट्री उत्पाद मानते हुए पृथ्वी और पृथ्वी पर उपस्थित जीवन का प्रतिरूप खोजते भटकता फिर रहा है! ए मूर्ख! (जी हाँ...आज मैं विज्ञान का मानवीकरण करते हुए उसे मूर्ख कहने का दु:साहस कर रहा हूँ) इसी पृथ्वी पर जिसके हजारों वर्षों के मानव इतिहास को तू अपने ही मापदंड़ों पर स्वीकार करता है, उस इतिहास से लेकर मौजूदा संसार में भी जब तुझको किसी एक जीव का भी प्राकृतिक प्रतिरूप नहीं मिलता तो तू किस आधार पर अनंत ब्रह्माण्ड़ में पृथ्वी और पृथ्वीवासी मानव के प्रतिरूप हो सकने की कल्पना कर पाता है!!!

अरे प्रकृति तो रचनाकार है, कोई धनलोलुप व्यवसायी नहीं। जो अपने प्रत्येक आविष्कार/निर्माण को फैक्ट्रियों के हवाले कर धन-मान-यश-अवैध कब्जे जमाने के लिए उनका प्रयोग करे। उसकी प्रत्येक रचना मौलिक है।

अत: कुछ समझना है तो उसके विधान को समझ। बनना है तो उसका सहयोगी बन। करना है तो अपनी चेतना को विकसित कर प्रकृति के साथ साम्य प्राप्त कर। अन्यथा वह तो स्वभाव से बड़ी ही निर्मम रचनाकार है।


Tuesday, 19 January 2016

-: पाँच :-

शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में नैतिक, सामाजिक और व्यवसायिक चेतना विकसित करना होता है।

जो शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति में में इन तीनों चेतनाओं को समानुपात में विकसित करे वह उत्तम,

जो केवल नैतिक और सामाजिक चेतना ही विकसित करे वह मध्यम,और

जो सामाजिक और व्यवसायिक अथवा मात्र व्यवसायिक चेतना तक ही सीमित हो वह शिक्षा व्यवस्था अधम श्रेणी की होती है।


कम से कम आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था तो अंतिम तीसरी श्रेणी में ही आती है।