Wednesday, 8 February 2017

वास्तविक आयु

एक स्त्री बडी धर्मपरायणा थी। सत्संग करती, साधू-संतों की सच्चे मन से सेवा करती, घर बाहर सभी जगह पूर्णमनोयोग से अपने धर्म का समुचित पालन करती।

एक बार उसके निवास पर कोई महात्मा पधारे। स्त्री के सेवा भाव से महात्मा बडे संतुष्ट  हुए। फिर उनकी धर्म-शास्त्रों पर चर्चा होने लगी। स्त्री की विद्वत्तापूर्ण बातें सुनकर महात्मा ने पूछा - पुत्री, तुम्हारी आयु क्या है?

स्त्री- बारह वर्ष, महाराज!

- तुम्हारे पति की?

- जी, दस वर्ष, महाराज!

- और पुत्री, तुम्हारी सास की आयु ?

- महाराज, यही कोई चार वर्ष!

महात्मा (आश्चर्य से) - और पुत्री तुम्हारे ससुर की आयु!?

स्त्री - महारज, वह तो अभी पैदा ही नहीं हुए हैं!

महात्मा चकरा गये। बोले - तुम झूठ तो नहीं बोल सकतीं परंतु यह सब क्या रहस्य है?

तब स्त्री ने उन्हें समझाकर कहा की महाराज इंसान की आयु तो उतनी ही मानने योग्य होती है जितनी वह स्वधर्म पालन और परमार्थ में प्रयोग करे। बाकि जीवन तो बस ईंट-पत्थर और पशु-पक्षियों के समान ही है। जिनके बारे में आपने पूछा वे रिश्ते तो बस हम इंसानों में ही होते है सो मैंने उनकी सच्ची आयु बता दी।

मेरे आने से पूर्व यहां सब धनपशु ही थे। दस वर्ष पूर्व पति ने और चार वर्ष पूर्व सास ने धर्म मार्ग पहचाना और उस पर चलने लगे, तो उतनी ही उनकी आयु मैंने बताई है। ससुर अभी भी वैसे ही धनपशु होकर जी रहे हैं तो मैं उनकी क्या आयु बताऊँ!


Tuesday, 3 January 2017

मानव धर्म का संदेश मानव जाति के नाम

[यहां प्रयुक्त 'सीमा-रेखा' शब्द केवल राष्ट्रों की सीमाओं के लिए नहीं बल्कि धर्म-जाति-संप्रदाय-लिंग आदि की जो रेखाऐं हमनें अपने चारों ओर खींच लीं हैं उन सभी के संदर्भ में है]

ओ! सीमा-रेखा पर लडने वालो
क्या मन में तुमने ठाना है?
खून बहाकर क्या जीतोगे
यह संसार तुम्हारा है!
धरती-अंबर, पर्वत-सागर
सूरज- चाँद-सितरा है,
नदिया-मलयज, कोकिल-शावक
चमन यह कितना प्यारा है!
बैर-भाव गर तुम छोडो
सब कुछ तुम पर वारा है।
मिटा लकीरें एक बनों
बस यह संदेश हमारा है।

रुको जरा ओ रण-दीवानो,
पहले जरा वे लाशें उठा लो
जिनको फिर ना कांधा मिलेगा!
माँ-बहनों के आँसू सुखा दो,
रण-भूमि का सन्नाटा हँसेगा!
जाते-जाते इक बात बता दो,
लहू धरा पर किसका गिरेगा?
नफरत की इस ज्वाला में
चमन बता दो किसका जलेगा!

नहीं विजय किसी को मिलती
बस होती मानवता की हानि है!
जिस मिटटी पर लहू है गिरता
बंजर वह बन जाती है।
भूत-पिशाच उगते हैं उसमें
नहीं रोटी पनप वहां पाती है!
जलजले नित आते उसमे
धरती माँ भी रोती है!

इसी लिए तो प्यारे बंधुओं
बस इतना कहता जाता हूँ,
छोड बंदूकें हल उठाओ
पुनर्नया निर्माण करो तुम
जोतो- खोदो इस धरा को
और सोना उपजाओ तुम
तभी भरेगा पेट सभी का
संग अपनी भूख मिटाओ तुम

नहीं कहता मैं कायर बनकर
जग को खूब हँसाओ तुम
दम है तो निज कर में
सागर से नीर उठाओ तुम
और मस्तक पर धरकर उसको
'पोखरण' में बरसाओ तुम
हरा भरा एक सुंदर आँचल
वसुंधरा को पहनाओ तुम!

भूख-प्यास से लड़ने वाले
हर प्राणि को यूँ सहलाओ तुम
हर चेहरे पर मुस्कान खिले
और संग उनके मुस्काओ तुम
प्रेम भाव की अग्नि दहाकर
खुद उसमें जल जाओ तुम
और प्रहलाद सम निज को तपाकर
सूरज सम चमकाओ तुम!

सीना ताने खडा यह अंबर
भू-चरणों में इसे झुकाओ तुम
सुमेरू गिरि को लेकर फिर से
मंथन अब कर डालो तुम
मिले जो विष-घट अमृत समझ
निज कंठ में उसको धारो तुम
और लेकर अमृत जगत में उसको
यूँ प्रेम सहित बिखराओ तुम
रहे ना द्वेष-ईर्षा इस जग में
ऐसा जहां बनाओ तुम
सत्य-अहिंसा का चोला धर
महा-मानव बन जाओ तुम
तब होवे जयकार तुमहारी
भारती-सुत कहलाओ तुम
भारती-सुत कहलाओ तुम
भारती-सुत कहलाओ तुम..........


Monday, 5 September 2016

-: छ: :-

#आज_का_विचार

कथित आधुनिक विज्ञान इस चराचर सृष्टि को भी कोई फैक्ट्री उत्पाद मानते हुए पृथ्वी और पृथ्वी पर उपस्थित जीवन का प्रतिरूप खोजते भटकता फिर रहा है! ए मूर्ख! (जी हाँ...आज मैं विज्ञान का मानवीकरण करते हुए उसे मूर्ख कहने का दु:साहस कर रहा हूँ) इसी पृथ्वी पर जिसके हजारों वर्षों के मानव इतिहास को तू अपने ही मापदंड़ों पर स्वीकार करता है, उस इतिहास से लेकर मौजूदा संसार में भी जब तुझको किसी एक जीव का भी प्राकृतिक प्रतिरूप नहीं मिलता तो तू किस आधार पर अनंत ब्रह्माण्ड़ में पृथ्वी और पृथ्वीवासी मानव के प्रतिरूप हो सकने की कल्पना कर पाता है!!!

अरे प्रकृति तो रचनाकार है, कोई धनलोलुप व्यवसायी नहीं। जो अपने प्रत्येक आविष्कार/निर्माण को फैक्ट्रियों के हवाले कर धन-मान-यश-अवैध कब्जे जमाने के लिए उनका प्रयोग करे। उसकी प्रत्येक रचना मौलिक है।

अत: कुछ समझना है तो उसके विधान को समझ। बनना है तो उसका सहयोगी बन। करना है तो अपनी चेतना को विकसित कर प्रकृति के साथ साम्य प्राप्त कर। अन्यथा वह तो स्वभाव से बड़ी ही निर्मम रचनाकार है।


Tuesday, 19 January 2016

-: पाँच :-

शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में नैतिक, सामाजिक और व्यवसायिक चेतना विकसित करना होता है।

जो शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति में में इन तीनों चेतनाओं को समानुपात में विकसित करे वह उत्तम,

जो केवल नैतिक और सामाजिक चेतना ही विकसित करे वह मध्यम,और

जो सामाजिक और व्यवसायिक अथवा मात्र व्यवसायिक चेतना तक ही सीमित हो वह शिक्षा व्यवस्था अधम श्रेणी की होती है।


कम से कम आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था तो अंतिम तीसरी श्रेणी में ही आती है।


Saturday, 16 January 2016

-: चार :-

जो त्याज्य हैं उन्हें मोह अथवा अन्य कारणवश प्रेम करना कुप्रेम कहलाता है।

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जो त्याग देने योग्य हैं जैसे मॄतक, अधर्मी, मूर्ख, अपराधी इत्यादि चाहे सगे ही क्यों न हों, त्याग देने ही हितकारी हैं। इन्हें मोहवश या स्वार्थवश चिपटाए रखना या चिपटे रहना कुप्रेम है।


Thursday, 7 January 2016

-: तीन :-


मौन  :-



मौन तीन प्रकार का होता है -

प्रथम - ऋषि अर्थात्‌ आत्मचिंतनी मौन - उत्तम।

द्वितीय - कोकिला अर्थात् ‌ सामयिक मौन - मध्यम। और

तृतीय - सियार अर्थात्‌ अन्याय समर्थक  मौन - अधम।


-: दो:-


रचनाकार को त्रिकालदर्शी होना पहली और अनिवार्य शर्त है। सीमित दृष्टि रखने वाला चाहे जो भी हो सकता है, रचनाकार कभी नहीं।

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त्रिकाल में जिसकी दृष्टि का परास जितना बड़ा होता है वह उतना ही बड़ा रचनाकार कहलाता है।

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'रचनाकर्म' की परास केवल साहित्य तक ही नहीं मानी जानी चाहिए। वास्तु-शिल्प-चित्रकला-अभिनय से लेकर विज्ञान-भाषा-राजनीति-सामाजिकता सब इसी परास में ही आते हैं।